उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इंटरनेट तक पहुँच और उसका उपयोग अनुच्छेद 21 तथा अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत एक मौलिक अधिकार है, और यह अधिकार केवल वयस्कों तक सीमित नहीं है। न्यायमूर्ति पारदीवाला और न्यायमूर्ति चंद्रन की खंडपीठ ने यह राय बच्चों के डिजिटल पहुँच से जुड़े मामले में दी।
मामला
क़दम 'जस्ट राइट्स फ़ॉर चिल्ड्रन अलायंस' की याचिका पर सुनवाई के दौरान उठाया गया। याचिकाकार ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर क़ानूनगर दायरे की मांग की थी, जबकि सरकार की ओर से उम्र सीमा आधारित प्रतिबंधों पर चर्चा चल रही थी।
अदालत ने बच्चों पर सामाजिक मीडिया और इंटरनेट सेवाओं का व्यापक, उम्र-आधारित प्रतिबंध लगाने के सुझाव को स्वीकार नहीं किया। खंडपीठ का तर्क रहा कि बच्चों को सुरक्षा भी चाहिए और डिजिटल पहुँच भी — दोनों में से किसी एक को ख़ारिज करना उचित नहीं।
- इंटरनेट पहुँच अनुच्छेद 21 और 19(1)(ए) के तहत मौलिक अधिकार करार दी गई
- उम्र आधारित पूर्ण प्रतिबंध को अस्वीकार किया गया
- केंद्र को नाबालिगों के लिए क़ानूनी सुरक्षा-उपाय मज़बूत करने का निर्देश
- इससे पहले 29 सितम्बर को इस मामले में सुनवाई हुई थी
फ़ैसले का मतलब यह है कि प्लेटफ़ॉर्म पर बच्चों की पहचान, उम्र-सत्यापन और सामग्री छंटाई जैसे उपाय संवैधानिक रूप से चुनिंदा और आनुपातिक होने चाहिए — एक ही उम्र रेखा खींचकर पूरी सेवा बंद करना मंज़ूर नहीं होगा।
शिक्षाविदों और डिजिटल अधिकार समूहों ने फ़ैसले को पहुँच के हक़ में महत्वपूर्ण बताया है, जबकि बाल-कल्याण संगठनों ने अब मज़बूत सुरक्षा ढांचे को ज़मीनी स्तर पर लागू करने पर ज़ोर दिया है।
स्रोत: लाइलॉ, एनडीटीवी, द हिंदू।


